देवघर, झारखंड: प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत वर्ष 2019 के देवघऱ, रामपुर स्थित नवंबर-दिसंबर में शुरू हुआ यह महत्वाकांक्षी हाउसिंग प्रोजेक्ट आज वर्ष 2025 में भी अधूरा पड़ा है। नगर विकास विभाग द्वारा लगभग 45 करोड़ रुपये की लागत से तैयार होने वाली इन आठ बहुमंज़िला इमारतों का सपना गरीब तबके को छत देने के लिए बुना गया था, मगर हकीकत में इनका हाल देखकर लोगों का माथा ठनक उठता है।
करीब 420 वर्गफुट क्षेत्रफल में तैयार किए जा रहे इन लगभग 600 फ्लैटों (84×8 बिल्डिंग) की योजना उन परिवारों के लिए थी जो गरीबी रेखा के नीचे जीवन-यापन करते हैं। योजना के अनुसार, BPL धारकों को प्राथमिकता देते हुए इन घरों का आवंटन होना था। मगर 5 साल गुजर जाने के बावजूद न तो बुकिंग हुई, न ही किसी को चाबी सौंपी गई।
योजना से जुड़े दस्तावेज़ बताते हैं कि एक फ्लैट की कीमत करीब 6 लाख 50 हज़ार रुपये तय की गई थी। कुल 665 फ्लैटों में से 39 का आवंटन रद्द कर दिया गया क्योंकि संबंधित लाभुकों ने अब तक पैसा जमा नहीं किया। दिलचस्प बात यह है कि बाकी सभी फ्लैट पहले ही बुक हो चुके हैं, फिर भी पूरी योजना अधर में लटकी हुई है।
आज स्थिति यह है कि इन इमारतों के चारों ओर इतनी झाड़-झंखाड़ और जंगली पेड़-पौधे उग आए हैं कि पहली मंज़िल तक हरी झाड़ियों में छिप चुकी है। भवनों की दीवारों से पलस्तर उखड़ने लगा है, सीलन और दरारें साफ नज़र आती हैं। जिन गलियारों में बच्चों की किलकारियाँ गूंजनी चाहिए थीं, वहाँ अब “खामोशी और बर्बादी” की गूंज सुनाई देती है।
आस-पास के स्थानीय निवासियों ने बताया कि इन अधूरी पड़ी इमारतों में अब शाम ढलते ही शराबियों और जुआरियों का जमघट लग जाता है। गरीबों के लिए बनाए गए इन सपनों के घर अब “गैरकानूनी गतिविधियों का अड्डा” बनते जा रहे हैं। इसके अलावा निर्माण के दौरान लाए गए लोहे के सरिए और बिखरे पड़े सामानों में अब जंग लग चुका है। जिन मशीनों और उपकरणों से काम होना था, वे खुले आसमान के नीचे खराब हो चुके हैं। हालत ये है कि करोड़ों की लागत वाली सामग्री अब कबाड़ में बदलती जा रही है। सवाल उठता है कि इस बर्बादी की जिम्मेदारी कौन लेगा और इन संसाधनों की सुध कौन लेगा।
अधिकारियों के मुताबिक, यह योजना “पूरी तरह सरकारी प्रोजेक्ट” है जिसमें लगभग 40% कार्य नगर निगम के अंतर्गत और 60% कार्य राज्य सरकार द्वारा संचालित विभागों के अंतर्गत आता है। स्थानीय नागरिकों की नाराज़गी मुहल्ले के लोगों का कहना है।
“सरकार ने बड़े-बड़े वादे किए थे कि गरीबों को पक्का मकान मिलेगा। मगर न मकान मिला, न कोई जवाब। अब यह जगह समाज विरोधी तत्वों का गढ़ बन चुकी है। हम रोज़ परेशान होते हैं। क्या गरीब की सुध लेने वाला कोई नहीं। दरअसल, इसके शुरू होने के बाद यह परियोजना पूरी तरह ठप पड़ गई। कार्य धीरे-धीरे (कछुए की चाल की तरह बनते गए) अब आलम ये की यहां सिर्फ़ पंक्षियों की आवाज सुनाई देती है।दो ब्लॉक नगर निगम को हैंडओवर भी कर दिए गए थे, मगर उनमें भी काम अधूरा ही पड़ा रहा।
आज हालत यह है कि पाँच साल बाद भी जिस योजना को “गरीब का सपना” कहा गया था, वह अब “अधूरी इमारतों और जंगली झाड़ियों का मंजर” बनकर रह गई है। सरकार की नीतियों और विभागीय लापरवाही ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि घोषणाएँ जितनी आसान होती हैं, उन्हें धरातल पर उतारना उतना ही कठिन। सवाल बड़ा है, गरीबों को छत देने की यह योजना कब पूरी होगी? या फिर 45 करोड़ रुपये खर्च करने के बाद भी यह योजना सिर्फ़ “कागकेज़ी घोड़ा” बनकर ही रह जाएगा ।









